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गोवर्धन पूजन की कहानी |
गोवर्धन पूजन तथा देवराज इंद्र की प्राचीन कहानी/भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पूजा क्यों आरंभ की थी?/गोवर्धन पूजन तथा देवराज इंद्र की प्राचीन कहानी/ जाने आखिर भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पूजा क्यों आरंभ की थी?/The ancient story of Govardhan Puja and Devraj Indra/ Know why Lord Krishna started Govardhan Puja? ~
एक समय जब देवराज इंद्र को अहंकार हो गया था तब इंद्र के अहंकार को दूर करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने एक लीला रची । एक दिन भगवान श्रीकृष्ण ने देखा कि पूरे ब्रज मे तरह तरह के पकवान बनाए जा रहे हैं और सभी ब्रजवासी किसी पूजा की तैयारी में जुटे हुए हैं । ये देख कर उन्होंने मैया यशोदा से प्रश्न किया माता ये सब किस पूजा की तैयारी कर रहे हैं, तब माँ यशोदा बोली लल्ला हम देवराज इंद्र की पूजा-पाठ करने के लिए अन्नकूट की तैयारी कर रहे हैं । यह सुन भगवान श्रीकृष्ण आगे पूछते हैं मैया हम इंद्र की पूजा क्यों करते हैं, माता यशोदा ने उत्तर दिया हम इंद्र की पूजा करेंगे तो अच्छी वर्षा होगी, यदि अच्छी वर्षा होगी तो अच्छी पैदावार होगी, जिससे हमारी गयाओ को अच्छा भोजन मिलेगा । ये है सुन भगवान श्रीकृष्ण ने इंद्र की निंदा करते हुए कहा, लेकिन मैया हमें तो ऐसे देवता की पूजा करनी चाहिए जो स्वयं प्रत्यक्ष आकर पूजन सामग्री स्वीकार करें । ये सुन मैया यशोदा के पास बैठी गोपियों ने कहा की 33 कोटि देवी देवताओं के राजा की इस प्रकार निंदा ना करो लल्ला यह सुन भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं, इंद्र में क्या शक्ति है जो वो हमारी रक्षा करेगा इंद्र से ज्यादा शक्तिशाली तो ये गोवर्धन पर्वत है, जो वर्षा का मूल कारण है । हमें गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए जहाँ हमारी गाये चरती है । इंद्रदेव तो कभी दर्शन भी नहीं देते और यदि उनकी पूजा ना करो तो वह क्रोधित हो जाते है ऐसे अहंकारी की पूजा कदाचित नहीं करनी चाहिए । तभी नन्द जी वहाँ आ गए और पूछने लगे इंद्र की पूजा करने से वर्षा होगी और हमें लाभ होगा, गोवर्धन की पूजा करने से क्या होगा । तब भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया हमारी गाये गोवर्धन पर्वत पर चरने जाती है । गोप - गपिकाओं के आजीविका का एकमात्र साधन गोवर्धन पर्वत है । यह सुनकर सभी लोग बहुत प्रभावित हुए और सभी ने मिलकर इंद्रदेव की जगह भगवान श्रीकृष्ण द्वारा बताई गई विधि से गोवर्धन पर्वत की पूजा अर्चना करी, गोवर्धन पर्वत ने समस्त पूजन सामग्री को स्वीकार किया और सबको खूब आशीर्वाद दिया । तभी नारद मुनि इन्द्र महोत्सव देखने की इच्छा से ब्रज में आये । वहाँ ग्वालों ने उन्हें बताया कि इस वर्ष से श्रीकृष्ण की आज्ञा अनुसार इन्द्र महोत्सव बंद कर दिया है और अब सभी ब्रजवासी गोवर्धन पूजन करेंगे । यह सुनते ही नारद मुनि उल्टे पांव इंद्र के दरबार में पहुंचे और बोले हे देवराज आप अपने महल में सुख की नींद ले रहे हैं, उधर ब्रज में आपकी पूजा समाप्त करके गोवर्धन पर्वत की पूजा हो रही है । ये सुनते ही देवराज इंद्र को क्रोध आ गया उन्होंने इसे अपना अपमान समझा और जोरों की वर्षा शुरू कर दी, भयभीत होकर सभी ब्रजवासी भगवान श्रीकृष्ण की शरण में गए, तब भगवान श्रीकृष्ण ने सभी को गोवर्धन पर्वत की शरण में जाने को कहा । सभी ब्रजवासी अपनी गया और बछड़ों के साथ गोवर्धन की तराई में पहुंचे । वहाँ भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठ ऊँगली पर उठा लिया, यह देख इंद्र को और क्रोध आया और उन्होंने मूसलाधार वर्षा शुरू कर दी । भगवान श्रीकृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र को आदेश दिया कि वह पर्वत के ऊपर जाकर वर्षा की गति को नियंत्रित करें और शेषनाग से कहा कि वह पानी को पर्वत की ओर आने से रोकें । इन्द्र लगातार सात दिनों तक मूसलाधार वर्षा करते रहे और सभी ब्रजवासी गोवर्धन पर्वत की छाया में सुखपूर्वक रहे । यह सब देखकर इंद्र को शंका हुई कि उनका मुकाबला करने वाला कोई साधारण मनुष्य नहीं हो सकता । तभी ब्रह्मा जी वहाँ प्रकट हुए और इंद्रदेव से बोले हे इंद्रदेव आप जिस बालक को परास्त करने की कोशिश कर रहे हैं वो और कोई नहीं भगवान श्री हरि विष्णु का अंश है और पूर्ण पुरुषोत्तम नारायण हैं । यह सुनकर देवराज इंद्र ने भगवान श्रीकृष्ण से अपने भूल की क्षमा मांगी । इसके बाद उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करी और इसी दिन से गोवर्धन पर्वत की पूजा की जाने लगी ।
जय श्री कृष्ण ।
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