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धर्मराज जी की कथा |
मकर संक्रांति कहानी /धर्मराज जी की कथा ~
नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए मकर संक्रांति की एक प्राचीन कहानी/धर्मराज जी की कहानी लेकर आए हैं । एक समय की बात है, किसी राज्य मे विष्णु सेवक हरिदास और उसकी पत्नी गुणवती रहते थे । गुणवती बहुत सुशील और भगवान विष्णु की परम भक्त थी वो एक पतिव्रता स्त्री थी, उसने प्रायः सभी प्रसिद्ध देवी देवताओं के व्रत आदि किये । एकादशी आदि का व्रत नियमपूर्वक किया परंतु धर्मराज जी की पूजा उसने कभी नहीं करी थी । अतिथि सेवा से वो कभी भी पीछे नहीं हटती थीं, इस प्रकार सदाचार तथा धर्म परायण से वो अपना जीवन व्यतीत कर रही थी । एक समय गुणवती मृत्यु को प्राप्त हो गयी धर्म कर्म के प्रभाव से यमदूत उसे आदरपूर्वक पापियों को भय प्रदान करने वाले धर्मराज जी के लोक में ले गए, जहाँ उसने देखा कि उस लोक के चार द्वार हैं । नगर के बीचो बीच धर्मराज्य जी का बहुत भव्य और सुन्दर मंदिर है जिसमें धर्मराज जी विराजमान हैं । उनके पास चित्रगुप्त जी भी विराजमान हैं जो मृत व्यक्तियों के पापों का लेखा जोखा धर्मराज जी को सुनाते हैं । यमराज के दूत गुणवती को वहाँ ले गए, जैसे ही गुणवती ने धर्मराज जी को देखा वो भयभीत होकर काँपने लगी और नीचे मुँह करके खड़ी हो गयी । तब चित्रगुप्त जी ने धर्मराज जी को गुणवती के पाप और पुण्य का लेखा जोखा सुनाया धर्मराज जी गुणवत्ता की भक्ति देखकर प्रसन्न हुए परंतु वह कुछ उदास थे, उनकी उदासी गुणवती को दिखाई दी । उसने धर्मराज जी से निवेदन किया, प्रभु मेरी समझ में ये नहीं आ रहा कि आप उदास क्यों हैं कृपा करके मुझे इसका कारण बताए । तब धर्मराज जी ने कहा है देवी तुमने जप-तप, व्रत, दान आदि कर सभी देवताओं को संतुष्ट किया है, परंतु मेरे नाम का तुमने कभी भी कोई भी दान, पुण्य, व्रत आदि नहीं किया । यह सुनकर गुणवती बोली, प्रभु मेरा अपराध क्षमा करें, मैं आप की उपासना की विधि नहीं जानती थी आप कृपा करके मुझे इसका कोई उपाय बताएं जिससे मनुष्यों को आपकी कृपा का पात्र बनने का अवसर प्राप्त हो । तब धर्मराज जी कहने लगे, सूर्य भगवान के उत्तरायण में जाते ही जो महा पुण्यदायी मकर संक्रांति आती है उसी दिन से मेरी पूजा शुरू करनी चाहिए । इस प्रकार सालभर मेरी कथा सुनने से और मेरी पूजा आदि कर दान पुण्य देने से व्यक्ति सभी प्रकार के दुखों से मुक्त हो जाता है और फिर वह व्यक्ति मेरे पास सदा सुखी रहते हैं । यह सुनकर गुणवती ने धर्मराज जी से प्रार्थना करी हे प्रभु, यदि ऐसी बात है तो मुझे इन यमदूतों से छुड़ाकर फिर से संसार में वापस भेज दीजिए, जिससे मैं आपकी कथा का प्रचार कर सकू, गुणवती की यह प्रार्थना सुनकर धर्मराज जी ने गुणवती को धरती लोक पर वापस जाने की स्वीकृति दे दी । उसी समय गुणवती के मृत शरीर में प्राण वापस आ गए । उसके पुत्र बोले, हमारी माता फिर से जीवित हो गई, इसके बाद गुणवती ने अपने पति और पुत्रों को धर्मराज जी की सारी बातें बता दी । गुणवती ने अपने पति और पुत्रों के साथ मकर संक्रांति के दिन से पूरे विधि विधान से धर्मराज जी की प्रतिदिन पूजा और कथा करना आरंभ कर दिया और साथ ही साथ दान पुण्य कर्म करना भी शुरू कर दिया । इस प्रकार गुणवती ने सालभर कथा सुनी और वह सभी सुखों को भोगने के बाद जब मृत्यु को प्राप्त हुई तो स्वर्ग में देवताओं ने गुणवती का आदर सत्कार किया । हे धर्मराज जी इस कथा को कहते सुनते और हुंकारा भरते सब पर अपनी कृपा बनाए रखियेगा ।
मकर संक्रांति में किस भगवान की पूजा करनी चाहिए ~
मकर संक्रांति पर क्या धर्म करना चाहिए/मकर संक्रांति पर किन किन चीजों का दान करना शुभ होता है ~
मकर संक्रांति पर किन चीजों का दान नहीं करना चाहिए ~
1.मकर संक्रांति के दिन उन वस्तुओं का दान भूलकर भी ना करें जिनका इस्तेमाल आप स्वयं ना करते हों ।
2.मकर संक्रांति के दिन सड़ी गली चीजों का और फटे पुराने कपड़ों का दान नहीं करना चाहिए ।
जय सूर्यदेव की ।
जय धर्मराज जी की ।
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