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पवित्र कार्तिक मास कथा-12 |
कार्तिक मास बूढ़े बाबा और उनकी दो बहुओं की कहानी ~
आज हम आपके लिए कार्तिक मास की बूढ़े बाबा और उनकी दो बहुओं की कहानी लेकर आए हैं । एक समय की बात है, एक बूढ़े बाबा थे उन बूढ़े बाबा की दो बहुएं थी । ससुर जी का काम दोनों बहुएं किया करती थी । एक बार जब कार्तिक मास आया तो ससुर जी कहने लगे बहु मैं कार्तिक नहाना चाहता हूँ, तो बड़ी बहू ने सुनते ही मना कर दिया और बोली, मुझसे आपके कार्तिक स्नान का काम नहीं होगा, आप छोटी बहू से कह दीजिये । इसके बाद ससुर जी छोटी बहू के पास गए और कहने लगे बहु मैं कार्तिक नहाना चाहता हूँ, छोटी बहू सीधी साधी थी, उसने कहा पिताजी आप बताइए मुझे क्या करना होगा, इसके बाद ससुर जी कहने लगे की ज्यादा कुछ नहीं करना बस बेटा रोज़ मेरे नहाने के लिए पानी भर देना, मेरी धोती धोकर सुखा देना और दोपहर का खाना बना देना अब छोटी बहू रोज़ सुबह 4:00 बजे उठकर कुएं से पानी भरकर ला देती जिससे ससुरजी स्नान कर लेते थे, उनकी धोती धोकर सुखा देती और दोपहर में ससुर जी को गर्म गर्म रोटी बना कर खिला देती । जब छोटी बहू ससुर जी की धोती धोकर सुखाती तो उसमें से गिरने वाली पानी की बूंदें वहाँ मोती के रूप में इकट्ठी हो जाती थी पर छोटी बहु इतनी नादान थी की वो समझ ही नहीं पाती थी और रोज़ सुबह झाड़ू लगाकर आंगन में एक तरफ मोतियों का ढेर इकट्ठा कर दिया करती थी और इसी तरह से एक माह निकल गया और कार्तिक मास समाप्त होने को आया तो ससुर जी ने कहा मैं कार्तिक समाप्त होने से पहले दो चार ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहता हूँ । छोटी बहू बोली, पिताजी मैं खाना बना देती हूँ और फिर आपको खेत से बुला लूंगी । बहू खाना बनाकर ससुर जी को खेतों से बुलवाने जाती है और कहती है, पिताजी मैंने खाना बना दिया है, आप घर चल कर ब्राह्मणों को खाना खिला दे और मैं खेत की रखवाली कर लेती हूँ, यह सुनकर पिता जी घर चले जाते हैं । अब छोटी बहू सोचती है कार्तिक महीने में ब्राह्मणों को तो खाना खिला रहे हैं और खेत में से इन बेचारी चिड़ियों को उड़ा रहे हैं । रामजी की चिड़िया, राम जी के खेत और ऐसा सोचकर वो चिड़ियों को दाना खाने देती है और चादर तान कर सो जाती है । जब चिड़िया ये दाना चुग रही होती है तो जो दाने जमीन पर गिरते हैं, वो सब हीरे मोती बन जाते हैं, धीरे धीरे उनका पूरा खेत हीरे मोतियों से जगमगाने लगता है । उस खेत के पास ही बड़े भाई का खेत था वो भी देखता है कि छोटे भाई का खेत हीरे मोतियों से जगमगा रहा है, बड़े बेटे से रहा नहीं जाता । वो अपने पिताजी से पूछता है की इसका क्या कारण है, पिताजी कहते है बेटा हम पर तो कार्तिक महाराज की कृपा हुई है । बड़ा भाई जाकर अपनी पत्नी को सारी बात बताता है, उसकी पत्नी के मन में लालच आ जाता है और वो मन ही मन सोचती है, कि ससुर जी ने तो पहले मुझसे कहा था मैंने क्यों मना कर दिया । अब वो साल भर इंतजार करती है और जब कार्तिक महिना आने वाला होता है तो जाकर ससुर जी से कहती हैं पिताजी आप इस बार कार्तिक स्नान नहीं करेंगे । ससुर जी कहते है बेटा इस बार मैं कार्तिक स्नान नहीं कर सकता, अब मेरी उम्र हो गई है । ये सुनकर बड़ी बहुत चिढ़ जाती है और गुस्से में कहने लगती हैं अपने छोटी बहू को तो मालामाल कर दिया, अब मेरी बारी आयी तो कहते है की उम्र हो गयी है नहीं पिताजी आपको कार्तिक स्नान करना ही होगा । ससुर जी थक हारकर हाँ कर देते हैं । बड़ी बहु हीरे मोती के लालच में ससुर जी का बहुत ख्याल रखती सवेरे कुएं से पानी लाकर भर देती। उनकी धोती धोकर सुखाती, धोती सुखाते वक्त उसे निचोड़ती नहीं थीं, जिससे ज्यादा पानी गिरे और ज्यादा मोती इकट्ठे हो । लेकिन उस पानी से हीरे मोती तो नहीं बने पर जमीन में गड्ढे हो गए । इधर कार्तिक मास समाप्त होने को आया तो ससुर जी ने कहा ब्राह्मणों को भोजन पर बुलाते है । तब वह बोली हाँ हाँ पिताजी एक ब्राह्मण को नौता दे देती हूँ और वो जल्दी से खाना बनाकर ससुर जी को बुला ने खेत पर चली गई और खुद खेत की रखवाली करने लगी । खेत में कोई भी चिड़िया दाना चुगने आती तो वो उसे उड़ा देती और कहती कोई भी चिड़िया, एक भी दाना मत खाओ, अभी ये सब मेरे हीरे मोती बनने वाले हैं । धीरे धीरे शाम हो गई और शाम तक उसके खेत में कोई भी हीरे मोती का ढेर नहीं बना बल्कि उसके खेत की फसल की बाली में दाने ही नहीं रहे तो वह ससुर जी के पास लड़ने पहुंची । तब ससुरजी ने कहा बहु तुने तो देखा देखी पैसे के लालच में मेरी सेवा करी, जबकि छोटी बहू ने तो निस्वार्थ भाव से मेरी सेवा की थी, इसलिए उसे कार्तिक महाराज की कृपा मिली और तुने देखा देखी करि, लालच करा तो तेरी फसल खराब हो गयी । हे कार्तिक महाराज जैसे आपने छोटी बहू पर कृपा करी, वैसे ही सब पर करना और जैसी बड़ी बहू पर करी वैसी किसी पर भी मत करना । कथा अधूरी हो तो पूरी करना और पूरी हो तो मान करना ।
जय कार्तिक महाराज ।
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