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कार्तिक मास की कहानी
कार्तिक मास के पहले दिन की बूढ़ी माई कार्तिक स्नान की पवित्र कहानी ~
एक समय की बात है किसी गांव में एक बूढ़ी माई अपने बेटे और बहू के साथ रहती थी। कार्तिक का महीना आया तो बूढ़ी माई कार्तिक स्नान के लिए गंगा जी जाने का विचार करने लगी। वो अपने बेटे और बहू से बोली, कार्तिक स्नान के लिए मैं गंगाजी जा रही हूँ, ये सुनते ही बाहु बोली माता जी मैं भी आपके साथ कार्तिक स्नान के लिए गंगा जी जाना चाहती हूँ। ये सुनते ही सास ने उसे साफ मना कर दिया और बोली बहु मेरी तो उम्र हो गयी है, तुम तो अभी बहुत छोटी हो, बाद में कभी चली जाना गंगा स्नान के लिए मेरे पीछे से घर में कोई ना कोई तो होना चाहिए, तुम्हें यही घर पर रहना होगा, घर की देखभाल करनी होगी। बहू बोली ठीक है माता जी आप गंगा स्नान करोगी तो मैं समझ लूंगी कि मैंने भी कर लिया। अब सास कार्तिक के महीने में गंगा स्नान के लिए हरिद्वार चली जाती है। सांस के जाने के बाद बहु बहुत दुखी हुई और वो मन ही मन खुद को कोसने लगी। पता नहीं मैंने ऐसे कौन से बुरे कर्म करे हैं जिनके कारण मैं कार्तिक स्नान के लिए गंगा जी नहीं जा पाई। ऐसा सोचकर वो बहुत दुखी हुई। उधर सास मन ही मन बहुत खुश थी कि वह गंगा स्नान के लिए आई है और बहू नहीं आ पाई। उधर बहू ने मन ही मन सोचा कोई बात नहीं गंगा जी ना सही, मैं घर पर ही कार्तिक स्नान कर लूँगी। ऐसा विचार करके बहु कुम्हार के पास गई और उससे तीन कुंडे खरीद लाई और उन्हें अपने घर की छत पर रख दिया। अब वह रोज़ रात को एक कुण्डे में पानी भरकर रख देती और अगले दिन सुबह सुबह उस पानी से स्नान कर लेती और कहती "सांस नहाये उड़े, बैठ बहू नहाए कुंडे बैठ हर हर गंगा मन चंगा तो कठौती में गंगा" बहु के ऐसा कहते ही गंगा जी की धार उसके कुंडे में आ जाती और बहु उस पानी से स्नान कर लेती। उधर दूसरी ओर गंगा स्नान करते वक्त बूढ़ी माई के मन में विचार आया कि वो अपनी अलमारी खुली छोड़ आई है, जिससे बहु उसकी अलमारी खोलकर उसके सारे गहने और रुपये पैसे निकाल लेगी। ऐसा विचार करते हुए बूढ़ी माई गंगा जी में स्नान करने लगी। जैसे ही उसने गंगा जी में डुबकी लगाई उसकी नाक की नथ खुलकर गंगा जी में बह गई। यह देखकर वो और ज्यादा दुखी हो गई और सोचने लगी मेरे सारे गहने मेरे पीछे से मेरी बहू ने ले लिए होंगे। मेरे पास बस ये नथ बची थी। जो भी गंगा जी में बह गई, ऐसा सोचकर वो बहुत दुखी होती है। उधर दूसरी तरफ जब अगले दिन बहु कुंड में भरे पानी से स्नान कर रही होती है तो उसके पानी में उसकी सास की नथ निकलती है जिसे देखकर वो सोचती है अरे ये नथ तो मेरी सास की है, ये यहाँ कैसे आई? ऐसा सोचकर वो उस नथ को उठाकर संभालकर रख देती है। अगले दिन जब सास फिर से गंगा स्नान करने लगती है। तो उसे अपने गहनों की फिर से चिंता होती है और अपनी खोई हुई नथ याद आती है। जैसे ही वो गंगा जी में डुबकी लगाती है तो उसके हाथ की अंगूठी भी गंगा जी में बह जाती है। यह देखकर वो और दुखी होती है। अगले दिन फिर जब बहु कुंडे से भरे पानी से स्नान करती है तो उस पानी में सांस की अंगूठी निकलती है। बहु उस अंगूठी को भी संभाल कर रख देती है। ऐसे ही देखते देखते कार्तिक का पूरा महीना समाप्त हो जाता है। कार्तिक समाप्त होने पर उसकी सास वापस अपने घर लौटकर आती है तो बहू ने सास को उसकी नथ और अंगूठी दी। यह देखकर सास पूछने लगी बहु ये नथ और अंगूठी तुम्हारे पास कहाँ से आई? तब बहू ने सास को अपने कार्तिक स्नान की सारी बात बता दी। जब बहू सास को अपने स्नान करें हुए कुंडे दिखाने छत पर गई तो वहाँ जाकर उन्होंने देखा कि सभी मिट्टी के कुंडे सोने में बदल गए हैं। यह देखकर वो दोनों चौंक गयी। सास बहू से कहने लगी माताजी मैं तो मिट्टी के कुंडे खरीद के लायी थी। ये सोने के कैसे हो गए? तब सास बहू से बोली बहु तुम पर कार्तिक महाराज की कृपा बरसी हैं। मैं गंगाजी स्नान करने गई थी, लेकिन मैंने सच्चे मन से स्नान नहीं किया। मुझे वहाँ भी अपने गहनों की चिंता थी इसलिए मेरी नथ और अंगूठी गंगा जी में बह गई। वहीं तुमने घर में ही बैठकर सच्चे मन से गंगा स्नान किया इसलिए तुम्हारे कुंडों में गंगा जी का पवित्र जल आ गया और कार्तिक महाराज ने तुम्हें तुम्हारी सच्चे मन से किए गए स्नान का फल दिया
जय कार्तिक महाराज की ।
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