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महादेव |
नंदी के दर्शन, नंदी के कान में बोलते हैं ~
महादेव सब कुछ है इस संसार में सभी शिव है, शिव ही आदि हैं और शिव ही अंत है । जहाँ पर भी भगवान शिव की पूजा होती है उस स्थान पर नंदी को भी याद किया जाता है। हर मंदिर में देखा जाता है कि भगवान शिव के सामने ही उनके वाहन नंदी की मूर्ति स्थापित होती है। जिस प्रकार भगवान शिव के दर्शन और पूजन का महत्त्व है, उसी प्रकार नंदी का दर्शन भी किया जाता है। नंदी भगवान शिव के वाहन ही नहीं है। वे उनके परम भक्त भी कहा जाता है कि अगर अपनी मनोकामना नंदी के कान में कही जाये तो वे भगवान शिव को उसे जरूर पहुंचाते हैं। आपने देखा होगा कि नंदी मंदिर के बाहर विराजमान होते हैं। कहा जाता है कि नंदी बाहर इसलिए विराजमान होते हैं ताकि भगत आसानी से उन तक अपनी बात पहुंचा सकें। तो आखिर क्यों है ऐसा, क्या है इसके पीछे की कथा? आइए जानते हैं इस लेख में। बोले हर हर महादेव शास्त्रों में इस बात का जिक्र किया गया है। की स्वयं भगवान शिवजी ने नंदी को ये वरदान दिया था की जो तुम्हारे कान में आकर जो अपनी मनोकामना कहेगा, उस व्यक्ति की सभी इच्छाएं जरूर पूरी होंगी। कहानी शुरू होती है नंदी के पिता शिलाद, शिलाद ने जमकर भोलेनाथ की तपस्या की थी ताकि उन्हें एक संतान प्राप्त हो और उनका वंश आगे चल पाए। भगवान शिव ने उनके कठोर तपस्या से खुश होकर उन्हें पुत्र रूप में प्रकट होने का वरदान दिया। वरदान में श्री बैल जैसा पुत्र मांगा। कुछ समय बाद भूमि जोतते समय एक बालक मिला। इसका नाम नंदी रख दिया। जब नंदी को अपना अल्पायु होने के बारे में पता चला तो महादेव की आराधना से मृत्यु को जीतने के लिए वन में चला गया और वहाँ जाकर उसने शिव का ध्यान करना शुरू कर दिया। भगवान शंकर नंदी के तप से प्रसन्न हो गए और उसे वरदान दे दिया कि नंदी तुम मृत्यु और भय से हमेशा हमेशा के लिए मुक्त हो। मैं तुम्हें अजर और अमर होने का वरदान देता हूँ। नंदी कैलाश पर भगवान शिव की निरंतर सेवा और आराधना करता था। कोई भी महादेव से मिलने आता तो पहले नंदी से मिलना अनिवार्य हो गया था। फिर 1 दिन शिलाद महादेव के पास एक अजीब विडंबना लेकर पहुंचे। शिलाद ने संतान का वरदान इसलिए मांगा था क्योंकि उनकी कोई संतान नहीं बची थी और अब सिर्फ नंदी ही था लेकिन वो भी महादेव की सेवा में व्यस्त था। इस वजह से शिलाद को लगा कि उसका वरदान पूरा ही नहीं हुआ क्योंकि उसे पिता का सुख ही नहीं मिला। यह सुन कर महादेव ने नंदी को बुलाया। महादेव स्वयं नंदी से प्रेम करते थे, लेकिन उन्होंने फिर भी नंदी को कहा कि उसे पुत्र होने का दायित्व निभाना होगा। जिसके बाद महादेव ने नंदी को शिलाद के साथ जाने को कहा। महादेव से दूर होने की पीड़ा नंदी को परेशान करती रही और उसने खाना पीना छोड़ दिया और वे काफी चिंतन में जीवन व्यतीत करने लगा। अपने पुत्र की यह दशा देखकर शिलाद एक बार पुन; महादेव के पास गए और उनसे प्रार्थना की कि वो नंदी को वापस बुला ले क्योंकि वो अपने पुत्र की ऐसी दशा नहीं देख सकते थे और साथ ही उनका वंश अब इस बात का प्रतीक होगा कि भगवान शिव स्वयं उनके पुत्र से प्रेम करते हैं क्योंकि नंदी के जाने के बाद महादेव को भी उसकी बहुत याद आ रही थी। वो भी नंदी से प्रेम करते हैं। नंदी के इस अतुल्य प्रेम को देखकर ही महादेव ने उसे वरदान दिया कि कोई भी प्रार्थना अगर महादेव तक पहुंचानी हो तो नंदी के कान में उसे बोल दिया जाए। ये प्रार्थना सीधा महादेव तक पहुँच जाएगी। यहाँ तक कि माता पार्वती ने भी भगवान शिव तक संदेश पहुंचाने के लिए नंदी के कान में ही बोला था। नंदी सदैव भगवान शिव के साथ ही रहते हैं। इसके बाद देवों के देव महादेव ने माता पार्वती के सम्मति से सभी गणों, गणेश और वेदों के समक्ष गणों के अधिपति के रूप में नंदी का अभिषेक करवाया। तो इस प्रकार नंदी बने नंदीश्वर इस कथा से हमें ये पता चलता है कि महादेव अपने सच्चे भक्तों को कभी अकेला नहीं छोड़ते। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार बाद में मरुतों की पुत्री सुयशा के साथ उनका विवाह हो गया। कहा जाता है की शिवजी ने नंदी को वरदान दिया था कि जहाँ उनका निवास होगा, वहाँ नंदी भी हमेशा विराजमान रहेंगे। इसलिए हर शिव मंदिर में शंकर परिवार के साथ साथ नंदी भी विराजमान होते हैं। नंदी जी जो बाद में नंदेश्वर बने, अगर मन साफ हो और भगवान के प्रति आस्था हो उसी मनुष्य का उद्धार हो सकता है तो बोलो
हर हर महादेव ।
हर हर महादेव ।
जय नंदी महाराज ।
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